निगाहों में तुम्हारी,
जब मै देखता हूँ।
तो मेरे प्यार का,
दीदार चार होता है।
तुम्हारी लफ़्जों को,
जब मै सुनता हूँ।
तो लगता है कि,
कानो का श्रृंगार होता है।
तुम्हारे रूप को,
मै देखता हूँ।
नेत्रों के तृप्ति की,
अनुभूति होती है।
तुम्हारे बदन को,
जब छूता हूँ।
तो प्रेम धारा का,
संचार होता है।
जब तुम्हारे ओठों को,
मै चूमता हूँ।
अनोखी गुदगुदी का,
एहसास होता है।
प्रिये! आगे मत लिखवाओं,
नही तो लोग बोलेगें।
साला खुले आम,
"सेक्सी" बात करता है।
Thursday, October 04, 2007
"सेक्सी" बात करता है
Tuesday, October 24, 2006
भविष्यफल के फेर मे न करो सत्यानाश
समीर जी ने यहां (हिन्दी चिट्ठों का वार्षिक भविष्यफल/ http://udantashtari.blogspot.com/2006/10/blog-post_24.html) पर भविष्य बताया है
सारी मलाई A,C,F,G,U, R मे है,
इसमे है आईना, फ़ुरसतिया और उडन तश्तरी,
ये समूह है तो क्रीमी लेयर
नही है इसमे किसी को घबराने की बात।
E,K,L,M,X के लिये रहेगा
पूरा वर्ष सन्तुलित
ये मत हो ज्यादा हैरान
बस रखे पाठको का ध्यान।
B,D,H,W,Z अब न सुधरे,
तो इनकी ऐसी तैसी तय है
नही कोई इनके लिये टोना टोटका,
बस ये न फोडे दूसरे का मटका।
P,Q,N,S,O ये आयी मेरी श्रेणी,
इसमे मेरा चिठ्ठा है प्रमेन्द्र प्रताप
इन चिठ्ठो के लिये नही है अच्छी बात,
ये हो सकते है वीरगति को प्राप्त
I,J,T,V,Y ये ऐसी श्रेणी है,
नही लिखोगे तो नही बनेगा काम।
फोटो कविता गजल से नही बनेगा काम,
आपने ब्लाग को लेख से सजाओ आज।
कोई व्यक्तिगत समीक्षा चाहत है,
तो करे 51 टिप्पणी आज,
नही खबर इन्हे अपनी है,
रख रहे है दुनिया भर का हिसाब।
भविष्य फल को पढ कर,
न करे ब्लाग का सत्यानाश।
लेख टिप्पणी करते रहो,
यही होगा उज्जवल भविष्य का राज।।
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Tuesday, October 10, 2006
मेरी व्यथा
जो मै कहता हूं,
उसे गलत अर्थ मे लिया जाता है।
चिठ्ठा चर्चा पर,
मेरी टिप्पणी पर टिप्पणियां हो जाती है।
मै कहता कुछ हूं,
उसे कुछ और समझा जाता है।
वह तो केवल मेरी टिप्प्णी थी,
जो केवल औपचारिकता मात्र मे दे डाली थी।
नाम वाम मे क्या रखा है
जब मन मे प्रेम समाया हो।
कहते है संसार मे दो ही चीजे है,
जो वापस नही किया जा सकती है,
वह है मुंह की वाणी और तरकश से निकला तीर।
कविराज को लिखा कविरात जब मैने,
पर छपने के बाद ध्यान गया मेरा,
पर क्लिक का तीर चला दिया था मैने,
और तब मै कुछ करने मे बेवस था।
चिठ्ठा चर्चा को नया रूप दिया,
कविवर राकेश खडेलवाल जी ने,
पर मैने उस पर नुक्स निकाला ।
क्षमा करों हे कविवर मुझको,
नही गलत दृष्टि से मैने टिप्पणी डाला।
मै हूं मै व्यर्थ की बाते है,
जब आपने कविवर कह डाला।
Friday, August 25, 2006
सीख
डूबते-डूबते तैरना सीख जाते है।
मझधार मे फंस कर
उसमे से निकलना सीख जाते है।।
Monday, August 21, 2006
गंगा
टकराती पाषण खण्डो से,
वह कभी न विचलित होती।
लिये विश्वास आत्मशक्ति का,
गंगा सदा प्रशन्नचित रहती।।2।।
लिये सकल पाप-पापी मनुष्य का,
गंगा कभी न पापी बनती।
लिये आदर्श मनुष्य के आगे,
एक श्रेष्ठ उदाहरण देती।।3।।
निर्मल जल की गंगा धारा,
जो साहस मार्ग सदा बताती।
खाकर ठोकर छिन्न भिन्न होकर,
फिर वह एक जल धारा बन जाती।।4।।
प्रमेन्द्र प्रताप सिंह
प्रयाग महा कुम्भ के अवसर पर 2001
Monday, August 07, 2006
मेरे लिंक
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